रफ़्तार

रफ़्तार
बाल मन में बबूल के बीज बोयें, तो आम की अपेक्षा ना रखें 

नई दिल्ली की एक मध्यम वर्गीय सोसाइटी में हर रोज़ की तरह उस दिन भी पार्क में बच्चे खेल रहे थे और पार्क की बेंचों पर महिलाएं रोज़ की गपशप में व्यस्त थीं. तूलिका हमेशा की तरह अपने  बेटे पार्थ की खूबियाँ गिनवा रही थी. तभी पार्थ फर्राटे से अपनी नई साइकिल लेकर निकला. जहाँ तूलिका की मुस्कुराहट बढ़ गई वहीँ संगीता का मन धक् से रह गया.

“तूलिका तुम्हें पार्थ को समझाना चाहिए, इतनी तेज़ रफ़्तार! सोसाइटी पार्क के आस पास इस समय कई लोग शाम की सैर करते हैं, कहीं किसी पल पार्थ का संतुलन बिगड़ा, तो किसी को चोट भी लग सकती है.”

तूलिका ने लापरवाही से कहा, “क्या संगीता, तुम भी इतनी सी बात का बतंगड़ बना रही हो? वैसे भी पार्थ है ही तेज़. पढ़ाई हो या खेल-कूद. आजकल कम रफ़्तार से बढ़ने वाले ज़िन्दगी में पीछे रह जाते हैं. मेरी मानो, तुम  भी अपने रोहित को नई साइकिल दिलवा ही दो, कब तक पुरानी खटारा घुमाता रहेगा…” तूलिका के बड़बोलेपन से प्रभावित कई महिलाओं ने उसका समर्थन किया, तो संगीता अपना सा मुंह लेकर चुप हो  गई. 

समय पंख लगा कर उड़ता रहा. संगीता, तूलिका आदि की शाम की गपशप वाली मण्डली इतने बरसों बाद भी शाम को सुख-दुःख बांटने का समय निकल ही लेती थी. एक दिन तूलिका को कुछ उखड़ा सा देखकर मीनाक्षी ने पुछा, “क्या बात है, तूलिका भाभी, आप आज बड़ी गुमसुम लग रही हो, अपना पार्थ भी दिखाई नहीं दिया. कहां है? इस समय तक तो लौट आता है ना वो रोज़ ट्यूशन से?”

तूलिका ने उदास होकर कहा, “अब क्या बताऊँ? इस पार्थ ने तो नाक में दम कर दिया है. जबसे इसे बाइक दिलवाई है, बस ऐसी हवा से बातें करता है, कि पूछो मत. आये दिन के चालान से परेशान हो ही चुके थे, कल ही  राँग साइड चलाते हुए संतुलन बिगढ़ गया. एक तो खुद के पैर में फ्रेक्चर हुआ, और उस सेंट्रो के नुकसान की भरपाई करनी पड़ी सो अलग. कैसे उसे समझाएं कि इतनी रफ़्तार ठीक नहीं... ”

संगीता को सालों पुराना तूलिका का कटाक्ष याद हो आया. पहले से परेशान तूलिका को और दुखी नहीं करना चाहती थी, सो चुप ही रही. लेकिन शायद उससे  नज़र मिलते ही, तूलिका को भी याद आ गया, “तुम ठीक ही कहती थी संगीता, अगर तभी से पार्थ को रफ़्तार के फायदे के साथ-साथ संतुलन के बारे में भी समझाया होता, तो आज हमारा बैंक बैलेंस यूँ तेज़ रफ़्तार से घट कर असंतुलित ना होता…”

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